अमेरिकी टेक कंपनी ऐपल ने 2nd जेनेरशन AirPods लॉन्च कर दिए हैं. AirPods ऐपल का वायरलेस इयरफोन है. भारत में इसकी कीमत 14,900 रुपये से शुरू होगी. इस बार कंरपी ने वायरलेस चार्जिंग का भी ऑप्शन दिया है, लेकिन इसके लिए आपको 18,900 रुपये खर्च करने होंगे. इसकी बिक्री अगले कुछ हफ्तों से शुरू हो सकती है.
ऐपल ने सबसे पहले 2016 में AirPods लॉन्च किए थे और शुरुआत में इसके डिजाइन को लेकर दुनिय भर में काफी मजाक भी बना. इस नए एयरपॉड्स में नया H1 चिप दिया गया है और कंपनी के दावे के मुताबिक यह 50% ज्यादा टॉकटाइम और ऐपल डिवाइस में 2 टाइम ज्यादा तेज कनेक्टिविटी देता है. कंपनी के मुताबिक यह चिप सुपीरियर ऑडियो के लिए खास तौर पर डिजाइन किया गया है.
इस पर AirPods में Hey Siri वॉयस ऐक्टिवेशन का भी सपोर्ट दिया गया है. यानी आप AirPods को Hey Siri बोल कर गाने चेंज कर सकते हैं, कॉल कर सकते हैं या मैप्स पर नेविगेशन कर सकते हैं.
इस बार AirPods के साथ वायरलेस चार्जिंग का सपोर्ट देने का मतलब ये है कि कंपनी ने एक नया वायरलेस चार्जिंग केस भी पेश किया है. ऐलल का कहना है कि यह केस 24 घंटे का लिस्निंग टाइम देता है. इसे किसी भी Qi एनेबल वायरलेस चार्जर पर रख कर आप चार्ज कर सकते हैं. इस वायरलेस चार्जिंग केस को आप अलग से भी खरीद सकते हैं और इसके लिए आपको 7000 रुपये देने होंगे.
डिजाइन की बात करें तो नए AirPods पुराने वाले से मिलते जुलते हैं. हालांकि इस बार वायरलेस चार्जिंग केस में बैटरी इंडीकेटर के लिए एलईडी लाइट दी गई है. हाल ही में सैमसंग ने भी नए वायरलेस इयरफोन्स Galaxy Buds लॉन्च किया है जिसकी कीमत भारत में 9999 रुपये है. इसमें वायरलेस चार्जिंग का सपोर्ट दिया गया है.
भारतीय जनता पार्टी लंबे इंतजार और मैराथन मंथन के बाद लोकसभा चुनाव के लिए प्रत्याशियों की पहली सूची जारी कर सकती है. होली के जश्न के बीच आज दोपहर बाद टिकटों की घोषणा संभव मानी जा रही है. बताया जा रहा है कि बीजेपी ने 250 उम्मीदवारों के नाम फाइनल कर लिए हैं. पहली लिस्ट में यूपी के करीब 35 उम्मीदवारों के नामों की घोषण हो सकती है.
इससे पहले बीजेपी की केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ समेत दोनों डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा और केशव मौर्य व प्रदेश बीजेपी अध्यक्ष महेंद्र नाथ पांडेय भी मौजूद रहे. इस मंथन के बाद यह बात सामने आ रही है कि रामपुर लोकसभा सीट से बीजेपी जया प्रदा को उतार सकती है.
साथ ही बिहार की सभी 17 सीटों के लिए भी बीजेपी उम्मीदवारों की घोषणा आज कर सकती है. जबकि महाराष्ट्र की 21 सीटों पर भी फैसला हो सकता है.
बंगाल के उम्मीदवारों के चयन को लेकर भी बीजेपी की बैठक हुई है. बताया जा रहा है कि कुल 42 में से 27 सीटों के उम्मीदवारों के नाम फाइनल हो गए हैं. सूत्रों के मुताबिक आसनसोल से बाबुल सुप्रियो चुनाव लड़ेंगे, जबकि दार्जिलिंग से एसएस अहलुवालिया को टिकट मिल सकता है. TMC से बीजेपी में शामिल हुए सौमित्र खान को भी टिकट मिल सकता है. इसके अलावा अनुपम हजारा को भी मौका मिलने की उम्मीद है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदगी में बीजेपी केंद्रीय चुनाव समिति की बुधवार को दिल्ली में हुई बैठक में छत्तीसगढ़ की 11 में से 5 सीटों के उम्मीदवारों के नाम भी तय कर लिए गए. छ्त्तीसगढ़ की बाकी सीटों पर 22 मार्च को फैसला हो सकता है.
Thursday, March 21, 2019
Thursday, March 7, 2019
पुलवामा के हमलावर आदिल डार के घर का आँखों देखा हाल
पुलवामा में 14 फ़रवरी को सीआरपीएफ़ के काफ़िले पर हुए आत्मघाती हमले के बाद, भारत और पाकिस्तान युद्ध के कगार पर आ गए थे.
हमला जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर हुआ था, और जिस जगह पर ये हुआ था वहां से 20 वर्षीय हमलावर आदिल डार का घर केवल 10 किलोमीटर दूर है.
काकपोरा गांव में अपने घर से एक साल पहले फ़रार होने के बाद आदिल डार जैश-ऐ-मोहम्मद में शामिल हो गए और उनकी तरफ़ से बंदूक उठा ली थी.
डार का घर एक दो-मंज़िला इमारत है, जहाँ पहली मंज़िल पर परिवार इकठ्ठा है. यह किसानों का परिवार है. ठंड और बारिश के बीच जब मैं वहां पहुंचा तो पहले आदिल के दो भाई और पिता ने बीबीसी से बात करने से इनकार कर दिया.
कुछ समय बाद आदिल के पिता ग़ुलाम हसन डार थोड़े खुले और कहा कि "लाश घर नहीं आई, बेटे को दफनाया नहीं, इसलिए अधूरापन लग रहा है".
जब मैंने पूछा कि सीआरपीएफ़ के 40 जवानों की मौत पर उन्हें अफ़सोस नहीं है?
जवाब में डार ने पिता ने कहा, "फौजी भी अपना काम करने आते हैं, उनके परिवार भी उनके नुकसान से पीड़ित हैं, हमारी तरह कुछ परिवारों को अपने बेटों की लाशें भी नहीं मिली होंगी, वो भी इस दर्द को महसूस कर रहे होंगे."
आदिल का संबंध जैश से था लेकिन पुलवामा सहित पूरे दक्षिण कश्मीर में पाकिस्तान से चलने वाले जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैबा की गतिविधियां कम हैं. जानकारों का कहना है कि दक्षिण कश्मीर में हिज़्बुल मुजाहिदीन सबसे ज़्यादा सक्रिय है.
हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन का नेतृत्व कभी टीचर रहे 33 वर्षीय रियाज़ नाइकू के हाथों में है. नाइकू का नाम घाटी के मोस्ट वांटेड लोगों की लिस्ट में सबसे ऊपर है.
कौन हैं रियाज़ नाइकू?
नाइकू का गांव पुलवामा का बेगपूरा है, सात साल पहले गणित में ग्रैजुएशन करने के बाद, नाइकू ने हथियार उठा लिए.
रियाज़ नाइकू के परिवार ने अब मान लिया है कि घर में देर या सवेर नाइकू की लाश ही आएगी. नाइकू के पिता असदुल्लाह नाइकू कहते हैं कि जब भी कोई एनकाउंटर होता है उन्हें लगता है उनका बेटा मरने वालों में शामिल होगा.
अलगाववाद का समर्थन और पिता की भावनाओं के बीच की कश्मकश के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, "एक मुस्लिम होने के नाते, यह गर्व की बात है, हम ये नहीं कहेंगे कि यह गलत है, अगर वो ड्रग्स या अवैध गतिविधियों में शामिल होता, तो हमारा नाम खराब होता, लेकिन हमें राहत है कि वो सही काम कर रहा है."
कैसे सोचता है कश्मीरी समाज?
कश्मीर में तैनात सरकारी अधिकारी जानते और मानते हैं कि स्थानीय लोगों की मदद इन लोगों को मिलती है.
डार का परिवार हो या नाइकू का, ये साधारण लोग हैं, लेकिन इनकी संतानें जब बंदूक उठाती हैं या मारी जाती हैं तो समाज में उन्हें ऊँचा दर्जा मिलता है. चरमपंथियों को स्थानीय लोगों का भरपूर सहयोग होता है. अगर लोकल लोग उन्हें पनाह न दें, उनके खाने-पीने का इंतज़ाम न करें और पुलिस के आने से पहले उन्हें आगाह न करें तो हिंसक आंदोलन टिक नहीं सकता.
लेकिन दूसरी ओर, सुरक्षा बलों का भी स्थानीय लोगों में मुखबिरों का एक बड़ा नेटवर्क है. एनकाउंटर उसी समय होता है जब कोई लोकल मुखबिर मिलिटेंट्स की गतिविधियों की ख़बर पुलिस को देता है. आँख-मिचौली में स्थानीय लोगों की मदद होने की वजह से डार या नाइकू जैसे लोग अक्सर बच निकलते हैं.
एनकाउंटर के समय गांव वाले कभी उन्हें फरार होने में उनकी मदद करते हैं और कभी पुलिस के सामने सीना तान कर खड़े हो जाते हैं तो कभी पत्थरबाज़ी करने लगते हैं.
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से हमने पूछा कि क्या हाल फिलहाल के वक्त में चरमपंथियों की स्ट्रैटेडी भी बदली है? इसके जवाब में सत्यपाल मलिक कहते हैं, "जहाँ तक मेरी जानकारी है कि पाकिस्तान में बैठे हुए इनके जो आक़ा हैं, उनका एक दबाव आया कि तुमने तो बहुत बेइज़्ज़ती करा दी. कुछ बड़ा करो, तो स्ट्रैटेजी पाकिस्तान और आईएसआई के दबाव में बनती-बदलती है."
घाटी में सब से अधिक सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैबा और हिज़्बुल मुजाहिदीन अलग-अलग इस्लामी विचारधारा के संगठन हैं. पहले दो संगठन पाकिस्तानी हैं. भारतीय कश्मीर में इनका वजूद है जिसमें कुछ लोकल मिलिटेंट्स होते हैं मगर अधिकतर सरहद के उस पार से आते हैं. इन तीनों संगठनों से मिलकर बनी जिहाद काउंसिल पाकिस्तान में है जिसमें मसूद अज़हर और हाफ़िज़ मोहम्मद सईद शामिल हैं.
विचारधारा के आपसी मतभेद के बावजूद इनके बीच अक्सर ऑपरेशनल तालमेल नज़र आता है. अधिकारी कहते हैं कि पुलवामा में ऐसा ही हुआ था. क्या आगे भी इस तरह के बड़े हमले हो सकते हैं?
दिल्ली के जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के अयमान माजिद ने कश्मीर में अलगाववादी हिंसा पर गहरा रिसर्च किया है. वे कहते हैं, "मेरे विचार में इस तरह के हमले अधिक नज़र नहीं आएँगे, मीडिया कह रहा है कि इस तरह के हमले कश्मीर में फिर से हो सकते हैं लेकिन मैं समझता हूँ कि पुलवामा जैसा बड़ा हमला कभी-कभार ही होगा."
पुलवामा हमले की जांच जारी है. मगर क्या ये सरकार की रणनीति की नाकामी को दर्शाता है? कश्मीर विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले इब्राहिम वानी कहते हैं कि सरकार ने पिछले साल मिलिटेंसी पर काबू पाने का दावा किया था मगर पुलवामा इसे नकारता है, "2018 में दावा किया गया कि बहुत सारे मिलिटनट्स मारे गए हैं और आइडिया था सैन्य कामयाबी का लेकिन पुलवामा ने इसे नकारा है."
अधिकारी जानते हैं कि मुठभेड़ में एक मिलिटेंट मरता है तो दूसरा खड़ा हो जाता है. पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में सक्रिय हथियारबंद नौजवानों की संख्या एक समय में 150 से 250 तक सीमित रहती है. मिलिटेंट्स जानते हैं कि ये संख्या सुरक्षा बलों को परेशान करने और उन्हें एंगेज रखने के लिए काफ़ी है.
हमला जम्मू-श्रीनगर हाईवे पर हुआ था, और जिस जगह पर ये हुआ था वहां से 20 वर्षीय हमलावर आदिल डार का घर केवल 10 किलोमीटर दूर है.
काकपोरा गांव में अपने घर से एक साल पहले फ़रार होने के बाद आदिल डार जैश-ऐ-मोहम्मद में शामिल हो गए और उनकी तरफ़ से बंदूक उठा ली थी.
डार का घर एक दो-मंज़िला इमारत है, जहाँ पहली मंज़िल पर परिवार इकठ्ठा है. यह किसानों का परिवार है. ठंड और बारिश के बीच जब मैं वहां पहुंचा तो पहले आदिल के दो भाई और पिता ने बीबीसी से बात करने से इनकार कर दिया.
कुछ समय बाद आदिल के पिता ग़ुलाम हसन डार थोड़े खुले और कहा कि "लाश घर नहीं आई, बेटे को दफनाया नहीं, इसलिए अधूरापन लग रहा है".
जब मैंने पूछा कि सीआरपीएफ़ के 40 जवानों की मौत पर उन्हें अफ़सोस नहीं है?
जवाब में डार ने पिता ने कहा, "फौजी भी अपना काम करने आते हैं, उनके परिवार भी उनके नुकसान से पीड़ित हैं, हमारी तरह कुछ परिवारों को अपने बेटों की लाशें भी नहीं मिली होंगी, वो भी इस दर्द को महसूस कर रहे होंगे."
आदिल का संबंध जैश से था लेकिन पुलवामा सहित पूरे दक्षिण कश्मीर में पाकिस्तान से चलने वाले जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैबा की गतिविधियां कम हैं. जानकारों का कहना है कि दक्षिण कश्मीर में हिज़्बुल मुजाहिदीन सबसे ज़्यादा सक्रिय है.
हिज़्ब-उल-मुजाहिदीन का नेतृत्व कभी टीचर रहे 33 वर्षीय रियाज़ नाइकू के हाथों में है. नाइकू का नाम घाटी के मोस्ट वांटेड लोगों की लिस्ट में सबसे ऊपर है.
कौन हैं रियाज़ नाइकू?
नाइकू का गांव पुलवामा का बेगपूरा है, सात साल पहले गणित में ग्रैजुएशन करने के बाद, नाइकू ने हथियार उठा लिए.
रियाज़ नाइकू के परिवार ने अब मान लिया है कि घर में देर या सवेर नाइकू की लाश ही आएगी. नाइकू के पिता असदुल्लाह नाइकू कहते हैं कि जब भी कोई एनकाउंटर होता है उन्हें लगता है उनका बेटा मरने वालों में शामिल होगा.
अलगाववाद का समर्थन और पिता की भावनाओं के बीच की कश्मकश के बारे में पूछे जाने पर वे कहते हैं, "एक मुस्लिम होने के नाते, यह गर्व की बात है, हम ये नहीं कहेंगे कि यह गलत है, अगर वो ड्रग्स या अवैध गतिविधियों में शामिल होता, तो हमारा नाम खराब होता, लेकिन हमें राहत है कि वो सही काम कर रहा है."
कैसे सोचता है कश्मीरी समाज?
कश्मीर में तैनात सरकारी अधिकारी जानते और मानते हैं कि स्थानीय लोगों की मदद इन लोगों को मिलती है.
डार का परिवार हो या नाइकू का, ये साधारण लोग हैं, लेकिन इनकी संतानें जब बंदूक उठाती हैं या मारी जाती हैं तो समाज में उन्हें ऊँचा दर्जा मिलता है. चरमपंथियों को स्थानीय लोगों का भरपूर सहयोग होता है. अगर लोकल लोग उन्हें पनाह न दें, उनके खाने-पीने का इंतज़ाम न करें और पुलिस के आने से पहले उन्हें आगाह न करें तो हिंसक आंदोलन टिक नहीं सकता.
लेकिन दूसरी ओर, सुरक्षा बलों का भी स्थानीय लोगों में मुखबिरों का एक बड़ा नेटवर्क है. एनकाउंटर उसी समय होता है जब कोई लोकल मुखबिर मिलिटेंट्स की गतिविधियों की ख़बर पुलिस को देता है. आँख-मिचौली में स्थानीय लोगों की मदद होने की वजह से डार या नाइकू जैसे लोग अक्सर बच निकलते हैं.
एनकाउंटर के समय गांव वाले कभी उन्हें फरार होने में उनकी मदद करते हैं और कभी पुलिस के सामने सीना तान कर खड़े हो जाते हैं तो कभी पत्थरबाज़ी करने लगते हैं.
जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक से हमने पूछा कि क्या हाल फिलहाल के वक्त में चरमपंथियों की स्ट्रैटेडी भी बदली है? इसके जवाब में सत्यपाल मलिक कहते हैं, "जहाँ तक मेरी जानकारी है कि पाकिस्तान में बैठे हुए इनके जो आक़ा हैं, उनका एक दबाव आया कि तुमने तो बहुत बेइज़्ज़ती करा दी. कुछ बड़ा करो, तो स्ट्रैटेजी पाकिस्तान और आईएसआई के दबाव में बनती-बदलती है."
घाटी में सब से अधिक सक्रिय जैश-ए-मोहम्मद, लश्कर-ए-तैबा और हिज़्बुल मुजाहिदीन अलग-अलग इस्लामी विचारधारा के संगठन हैं. पहले दो संगठन पाकिस्तानी हैं. भारतीय कश्मीर में इनका वजूद है जिसमें कुछ लोकल मिलिटेंट्स होते हैं मगर अधिकतर सरहद के उस पार से आते हैं. इन तीनों संगठनों से मिलकर बनी जिहाद काउंसिल पाकिस्तान में है जिसमें मसूद अज़हर और हाफ़िज़ मोहम्मद सईद शामिल हैं.
विचारधारा के आपसी मतभेद के बावजूद इनके बीच अक्सर ऑपरेशनल तालमेल नज़र आता है. अधिकारी कहते हैं कि पुलवामा में ऐसा ही हुआ था. क्या आगे भी इस तरह के बड़े हमले हो सकते हैं?
दिल्ली के जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी के अयमान माजिद ने कश्मीर में अलगाववादी हिंसा पर गहरा रिसर्च किया है. वे कहते हैं, "मेरे विचार में इस तरह के हमले अधिक नज़र नहीं आएँगे, मीडिया कह रहा है कि इस तरह के हमले कश्मीर में फिर से हो सकते हैं लेकिन मैं समझता हूँ कि पुलवामा जैसा बड़ा हमला कभी-कभार ही होगा."
पुलवामा हमले की जांच जारी है. मगर क्या ये सरकार की रणनीति की नाकामी को दर्शाता है? कश्मीर विश्वविद्यालय में पढ़ाने वाले इब्राहिम वानी कहते हैं कि सरकार ने पिछले साल मिलिटेंसी पर काबू पाने का दावा किया था मगर पुलवामा इसे नकारता है, "2018 में दावा किया गया कि बहुत सारे मिलिटनट्स मारे गए हैं और आइडिया था सैन्य कामयाबी का लेकिन पुलवामा ने इसे नकारा है."
अधिकारी जानते हैं कि मुठभेड़ में एक मिलिटेंट मरता है तो दूसरा खड़ा हो जाता है. पुलिस की रिपोर्ट के मुताबिक़ राज्य में सक्रिय हथियारबंद नौजवानों की संख्या एक समय में 150 से 250 तक सीमित रहती है. मिलिटेंट्स जानते हैं कि ये संख्या सुरक्षा बलों को परेशान करने और उन्हें एंगेज रखने के लिए काफ़ी है.
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