हैकर, डेटा लीक- ये सुनते ही जो छवि दिमाग़ में उतरती है, वो अक्सर अंधेरे में हुड से सिर ढँक कर कंप्यूटर के सामने बैठे एक युवा की होती है.
ऐसा शायद इसलिए क्योंकि डेटा लीक से जुड़े अधिकतर मामले चोरी-छिपे किए गए जाते हैं और ऐसे मामलों में जो ख़बरें हमारे सामने आती हैं उनमें किसी किशोर या युवा का नाम होता है.
क्या ये कोई पैटर्न है या फिर युवा ही ऐसा करने के लिए अधिक आकर्षित होते हैं? ऐसा क्यों है?
एथिकल हैकर साई कृष्णा कोटपल्ली जब इंजीनियरिंग की पहले साल की पढ़ाई कर रहे थे, तब उनके दोस्त ने उन्हें हैकिंग के बारे में बताया था.
वो कहते हैं, "जो किशोर होते हैं उनके पास काफी समय होता है और नया जानने की इच्छा भी अधिक होती है. उनके लिए ये रोमांच होता है कि वो अपने दोस्त का फ़ेसबुक हैक कर उनके सभी मैसेज पढ़ सकते हैं. या फिर किसी चीज़ पर 10 फीसदी डिस्काउंट को 90 फीसदी कर सकते हैं."
आनंद प्रकाश एथिकल हैकर हैं और अब ऐपसिक्योर नाम की कंपनी के सीईओ हैं.
आनंद प्रकाश कम उम्र में फेसबुक, ऊबर और ट्विटर जैसी कंपनियों के सॉफ्टवेयर में गड़बड़ी तलाश कर बग बाउंटी के रूप में कमाई करने के लिए जाने जाते हैं.
21 साल की उम्र में आनंद प्रकाश ने सबसे पहले हैकिंग की तो उन्होंने फेसबुक बग बाउंटी में हिस्सा लिया.
वो कहते हैं, "हैकिंग के ज़रिए जब आप बग बाउंटी का काम करते हैं तो आपको ईनाम का पैसा तो मिलता है, पहचान भी मिलती है और साथ में आपका करियर भी बन जाता है. ये युवाओं के लिए काफ़ी अच्छा साबित होता है. इन सबके अलावा जिज्ञासा भी होती है क्योंकि डेवेलपर तो हर कोई होता है लेकिन हैकर कम ही लोग होते हैं."
पैसा, पावर और रोमांच
एथिकल हैकर राहुल कुमार सिंह ने 9-10 साल की उम्र में जब पहली बार हैकिंग की थी, तब वो किसी और के कंप्यूटर में बिना उसकी जानकारी के घुसने के तरीक़े सीख रहे थे. लेकिन बाद में उन्होंने अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी भी खोली और अब वो साइबर फॉरेंसिक जांचकर्ता के तौर पर काम कर रहे हैं. अब वो केवल अपने हुनर को बनाए रखने के लिए हैकिंग करते हैं.
वो कहते हैं, "हर घर में फोन हैं, और रोक-टोक ज़्यादा है. जो चीज़ आसानी से मिलती नहीं, वो लोग चोरी करते हैं जैसे सॉफ्टवेयर नहीं मिला तो हैक कर लिया. और ये ऐसी चीज़ है कि कोई भी इसे सीखने के लिए उत्साहित रहता है. इसमें पैसा भी है और पावर भी, लेकिन पैसा और पावर में पावर बड़ी होती है."
राहुल कहते हैं, ''युवाओं के लिए ये पावर एक रोमांच की तरह है, जो उन्हें आकर्षित करता है. उस समय सोचने समझने की शक्ति होती नहीं है. उम्र का क्रेज़ होता है, कहते हैं ना उम्र का दोष होता है."
एथिकल हैकर रिज़वान शेख़ 16 साल की उम्र से हैकिंग के मैदान में हैं. आज वो साइबर क्राइम कंसल्टेंट के तौर पर काम करते हैं और एथिकल हैंकिग सिखाते हैं.
वो कहते हैं, "फ्री टाइम का होना, फिर उसमें इंटरनेट तक पहुंच होना. ये दोनों वजहें ज़्यादातर मामलों में स्कूल या कॉलेज में पढ़ रहे बच्चों के पास होती हैं. उनमें सीखने की क्षमता और इच्छा भी काफ़ी होती है."
वो कहते हैं, ''हम उस उम्र में ऑनलाइन गेम खेलते थे और फिर गेम के हैक खोजते थे. इस तरह हम ऐसी ऑनलाइन कम्युनिटी से मिले जहां हैकर्स अधिक थे. धीरे-धीरे यहीं से युवा की दिशा तय हो जाती है. ऐसी कम्युनिटी में आप देखेंगे तो अधिकतर 15 से 25 साल के युवा इनके सदस्य होते हैं.''
इसी साल जर्मनी की चांसलर एंगेला मर्केल समेत सैकड़ों राजनेताओं का निजी डेटा एक हैकर ने सोशल मीडिया पर लीक कर दिया था. ये हैकर 20 साल का एक स्कूली छात्र था. उसका कहना था कि वो सरकार से नाराज़ है.
बीते साल 15 साल के एक किशोर ने खुद को सीआईए प्रमुख जॉन ब्रेनन के तौर पर पेश कर अफ़ग़ानिस्तान और इटली में सीआईए के ख़ुफिया अभियानों से जुड़े कंप्यूटर में घुसने की कोशिश की.
2012 में 22 साल के एक युवक ने 60 लाख कंप्यूटर्स में वायरस डालकर लोगों के बैंक अकाउंट डीटेल निकाल लिए. इसके ज़रिए उसने 15 करोड़ रूसी रूबल की चोरी की.
एक जांच के तहत 2012 में ही एक हैकिंग ग्रुप से जुड़े 25 लोगों को इंटरपोल ने गिरफ्तार किया था. इंटरपोल 17 से 40 की उम्र के हैकर्स को आर्थिक मदद देने वालों की पड़ताल कर रहा था. गिरफ्तारियों के बाद इंटरपोल की वेबसाइट डाउन हो गई.
ब्रिटेन में 2012 में लूल्ज़सेक हैकिंग ग्रुप के दो सदस्यों को वेबसाइट हैंकिंग के आरोप में सज़ा सुनाई गई थी. ये दोनों 18 और 19 साल के थे.
जाने-माने हैकर जेरेमी हैमन्ड ने 18 साल की उम्र में हैकदिससाइट नाम से एक वेबसाइट बना ली थी. उन्हें 2012 में 27 साल की उम्र में स्ट्रैटेजिक फोरकास्टिंग नाम की निजी खुफ़िया कंपनी से डेटा चुराने के आरोप में 10 साल की सज़ा सुनाई गई. उनका कहना था कि ये कंपनी मानवाधिकार के समर्थन में बोलने वालों की जासूसी करती है.
दुनिया के कई देशों में दहशत फैलाने वाले ब्लू व्हेल गेम को रूस में रहने वाले 21 साल के फिलिप बुडकिन ने बनाया था. ये खेल बच्चों के दिमाग़ को इस तरह अपने काबू में कर लेता था कि गेम की वजह से कई आत्महत्या की कोशिश के मामले सामने आए. बुडकिन का कहना था कि उन्हें लगता है कि वो सही हैं. वो 18 साल की उम्र से कंप्यूटर गेम बना रहे थे.
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